बिहार की राजनीति में एक बार फिर मोकामा हत्या कांड ने हलचल मचा दी है। जेडीयू उम्मीदवार और पूर्व विधायक अनंत सिंह समेत दो अन्य की गिरफ्तारी ने राज्य में अपराध, राजनीति और सत्ता के गठजोड़ पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह घटना न केवल एक राजनीतिक हत्या के रूप में देखी जा रही है, बल्कि इसे आगामी बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के सियासी समीकरणों से जोड़कर भी देखा जा रहा है।
⚖️ मोकामा हत्या कांड: पूरा मामला
मोकामा क्षेत्र में जन सुराज पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता दुलार चंद यादव की हत्या ने स्थानीय राजनीति को झकझोर दिया। हत्या के पीछे कथित रूप से राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और क्षेत्रीय दबदबे की लड़ाई बताई जा रही है।
पुलिस और सीआईडी की संयुक्त टीम ने इस मामले की जांच शुरू की, जिसमें कई अहम साक्ष्य सामने आए। जांच में यह भी संकेत मिले कि हत्या पूर्व नियोजित थी और इसके पीछे राजनीतिक प्रभावशाली लोगों की भूमिका थी।
इसी कड़ी में पूर्व विधायक अनंत सिंह, उनके करीबी सहयोगी और एक समर्थक को गिरफ्तार किया गया। तीनों पर हत्या, साजिश और हथियार अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया है।
🚨 जांच और प्रशासनिक रुख
सीआईडी और बिहार पुलिस की संयुक्त कार्रवाई के बाद मोकामा और आसपास के इलाकों में भारी पुलिस बल तैनात किया गया है।
जांच एजेंसियों ने सीसीटीवी फुटेज, कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स और चश्मदीदों के बयान एकत्र किए हैं। शुरुआती रिपोर्ट के अनुसार, दुलार चंद यादव की हत्या में प्रयुक्त वाहन और हथियारों का सीधा संबंध अनंत सिंह के सहयोगियों से बताया जा रहा है।
राज्य सरकार ने घटना को “गंभीर” मानते हुए विशेष जांच दल (SIT) बनाने के आदेश भी जारी किए हैं।
⚖️ अनंत सिंह की पृष्ठभूमि और राजनीतिक यात्रा
अनंत सिंह, जिन्हें “छोटा सरकार” के नाम से भी जाना जाता है, बिहार की बाहुबली राजनीति का प्रमुख चेहरा माने जाते हैं। वे पहले राजद के टिकट पर मोकामा से विधायक रहे, बाद में जेडीयू में शामिल हो गए।
उन पर पहले भी हत्या, अपहरण, रंगदारी और अवैध हथियार रखने जैसे कई गंभीर आरोप लग चुके हैं। बावजूद इसके, उनका स्थानीय मतदाताओं पर मजबूत प्रभाव और सत्ता से नजदीकी उन्हें लगातार राजनीतिक संरक्षण दिलाती रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि —
“एनडीए और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा ऐसे विवादास्पद नेताओं को बार-बार मंच देना, बिहार की राजनीति में अपराध के सामान्यीकरण की ओर संकेत करता है। सत्ता द्वारा अपराधी छवि वाले नेताओं को संरक्षण देना लोकतंत्र की बुनियाद पर गहरा प्रहार है।”
इस तरह का सत्ता-संरक्षण बिहार में राजनीतिक अपराध के लिए उर्वर भूमि तैयार करता है, जहां अपराधी राजनीति में वैधता प्राप्त कर लेते हैं।
🗳️ बिहार चुनाव 2025 पर मोकामा हत्या कांड का असर
मोकामा हत्या कांड का प्रभाव केवल एक क्षेत्रीय घटना तक सीमित नहीं रहेगा। यह मामला बिहार की सत्ता में बैठे दलों की छवि, विश्वसनीयता और चुनावी रणनीति पर भी असर डाल सकता है।
विपक्षी दलों — आरजेडी, कांग्रेस और जन सुराज पार्टी — ने इसे नीतीश कुमार सरकार की नाकामी करार दिया है।
जन सुराज पार्टी के प्रवक्ता ने बयान दिया कि —
“अगर अपराधी ही सत्ता की छत्रछाया में रहेंगे, तो आम जनता को न्याय कौन देगा? यह हत्या केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि लोकतंत्र की हत्या है।”
वहीं, जेडीयू की ओर से कहा गया कि जांच निष्पक्ष और कानून के मुताबिक होगी, लेकिन विपक्ष इसे “राजनीतिक अपराध की परंपरा” से जोड़ रहा है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला ग्रामीण वोटबैंक पर बड़ा असर डाल सकता है।
मोकामा और आसपास के इलाकों में अनंत सिंह का जनाधार भले मजबूत रहा हो, लेकिन हत्या का आरोप लगने के बाद उनके समर्थकों में भी असमंजस की स्थिति बन गई है।
विपक्ष इसे “बाहुबली बनाम जनता” की लड़ाई के रूप में पेश कर रहा है, जबकि सत्ताधारी गठबंधन इसे “कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा” बताने की कोशिश कर रहा है।
🔍 बिहार की राजनीति में अपराधीकरण की जड़ें
बिहार की राजनीति में बाहुबल और राजनीति का रिश्ता नया नहीं है। मोकामा हत्या कांड ने केवल यह दिखाया कि यह प्रवृत्ति अब भी जिंदा है।
राज्य में कई ऐसे नेता हैं जो आपराधिक मामलों का सामना करते हुए भी चुनाव जीतते रहे हैं।
राजनीतिक दलों द्वारा ऐसे चेहरों को टिकट देना “वोट बैंक राजनीति” का हिस्सा बन चुका है, जहां नैतिकता और ईमानदारी की जगह प्रभाव और डर ने ले ली है।
वोटरों में भी दोहरी मानसिकता देखने को मिलती है — एक तरफ वे अपराध-मुक्त राजनीति की बात करते हैं, दूसरी तरफ स्थानीय “मददगार” छवि वाले बाहुबलियों को अपना नेता मान लेते हैं।
इस सामाजिक स्वीकृति के चलते ही अपराधी नेताओं की साख खत्म नहीं होती, बल्कि कई बार और मजबूत हो जाती है।
🧭 निष्कर्ष: सत्ता की जिम्मेदारी और जनता का फैसला
मोकामा हत्या कांड ने एक बार फिर यह सवाल उठा दिया है —
क्या बिहार की राजनीति कभी अपराध-मुक्त हो पाएगी, जब सत्ता स्वयं अपराधियों को संरक्षण दे रही है?
यह घटना केवल एक हत्या नहीं, बल्कि बिहार के लोकतांत्रिक ढांचे पर एक गंभीर चोट है।
यदि सरकार वास्तव में अपराध-मुक्त शासन का दावा करती है, तो उसे ऐसे नेताओं से दूरी बनानी होगी और सख्त कदम उठाने होंगे।
आने वाले बिहार चुनाव 2025 में जनता के सामने दो विकल्प होंगे —
या तो वे पुराने बाहुबली प्रभाव वाले सिस्टम को बनाए रखें, या एक नए, स्वच्छ राजनीतिक दौर की शुरुआत करें।
मोकामा की यह घटना तय करेगी कि बिहार किस दिशा में बढ़ना चाहता है — सत्ता के भय की ओर या न्याय के विश्वास की ओर।
